कविता। ग़ज़ल। अपनी बात।

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

जिंदगी

हैरान तो हो तुम भी किस तरह रह गए ।
तेरे सितम को जालिम किस तरह सह गए।।
जब भी वजूद तेरा तूफ़ान बन के आया।
हम रेत की दीवार बने और ढह गए ॥
आखों में नींद कब थी जो ख्वाब देखते।
ख्वाब के लिए भी तरस करके रह गए॥
आसान नहीं होता जिए जाना जिंदगी।
होठो से कह न पाए तो आखो से बह गए॥
ऊँगली पकड़ कर मौत ने पूछा भी कई बार।
तुझ बेवफा के साथ मगर जिन्दा रह गए॥


1 टिप्पणी:

  1. जब भी वजूद तेरा तूफ़ान बन के आया , हम रेत की दीवार बने और ढह गये। सुन्दर , बहुत ही नाज़ुक शे"र बधाई।

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