कविता। ग़ज़ल। अपनी बात।

रविवार, 11 जुलाई 2010

अनामिका जी ! आप से कहना है ....

अनामिका जी !
धन्यवाद् ! उस प्यार के लिए जो अपने मेरी रचना को पढ़ कर उस पर टिप्पणी किया. सस्नेह मेरा अभिवादन ! उस आग्रह के लिए जिसने मुझे चर्चा मंच पर आमंत्रित किया. क्षमा,मेरी असमर्थता के लिए की मैं 9 जुलाई को आप सभी से संपर्क नहीं कर पाई.
अनामिका जी !आप के ब्लॉग पर ही लिख रही हूँ तो साक्ष्य देने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी की मैंने आप की सभी कवितायेँ पढ़ी.साहित्य में रूचि रखना ही साहित्य प्रेम है.हम भारतीय हैं,हमारी मातृभाषा हिन्दी है,हमारा अपना विपुल साहित्य है उससे प्रेम करना यानि अपने समाज और संस्कृति,सभ्यता से प्रेम करना है,किसी भी राष्ट्र के श्रेष्ठ नागरिक का यही प्रथम कर्तव्य और दायित्व है,जिसे आप पूर्ण श्रद्धा और आत्मविश्वास के साथ निभा रही हैं,यह देखकर मुझे आत्मसंतुष्टि का अनुभव हुआ.कुछ वर्ष पहले यह एक चिंतन का विषय था की नई पीढ़ी जो अंग्रेजियत का शिकार हो रही है उससे हिन्दी भाषा के भविष्य और अस्तित्व पर खतरा आ सकता है लेकिन हिन्दी भाषा की पत्रिकाओं की प्रकाशन दर में निरंतर हो रही वृद्धि ने उस दुश्चिंता के ग्राफ को काफी नीचे कर दिया है.इन्टरनेट पर हिन्दी की साइटों,ब्लोगों ने तो हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय पाठकों का एक इतना बड़ा समूह दे दिया है कि कोई चाहे भी तो हिन्दी को पीछे नहीं धकेल सकता.यूँ समझिये कि जब आप जैसी साहित्यिक प्रतिभा संपन्न और प्रतिनिधित्व करने के उत्साह से पूर्ण महिलाएं हिन्दी भाषा में ही ब्लॉग के साथ इस मुहिम में शामिल हो रही हैं तो कहना ही चाहिए "राष्ट्रभाषा जिंदाबाद".
मैं व्यवसाय से अध्यापन के क्षेत्र से जुडी हुई हूँ.व्यक्तित्व से सोशल वर्कर हूँ,रूचि से साहित्य-प्रेमी हूँ ,मेरी रचनाएँ इन सभी तत्वों से तैयार शोभा गुप्ता की सवेंदानाओं का उदगार हैं . आजकल मैं एक संस्था को संचालित कर रही हूँ जिसका मुख्य उद्देश्य ऐसे बच्चों को शिक्षा और चिकित्सकीय उपचार मुहैया करवाना है जो इसे प्राप्त कर पाने में आंशिक या पूर्ण रूप से असफल रहे हैं या रह जाते हैं.हमारे पास ऐसे- ऐसे बच्चे आते हैं जिनकी उम्र पंद्रह से बीस वर्ष की हो गई है जिन्होंने कभी स्कूल के अन्दर पाँव तक नहीं रखा.आने वाली १८ जुलाई को एक ऐसी ही लड़की की हम शादी करने जा रहे हैं जिसकी उम्र बीस वर्ष है जो घरो में झाड़ू-बरन करके अपना और अपनी दादी का गुजारा कर रही है,जिसके पास माँ-बाप ,भाई - बहन कोई भी नहीं है जो उसे किसी भी प्रकार से आर्थिक,सामाजिक सहयोग दे सके.पढ़ने के लिए बड़ी मुश्किल से तैयार हुई उसने कहा"बस मैं लिखना - पढ़ना सीखूंगी वह भी रात में जब काम कर के वापिस आ जाऊंगी,बोलो मंजूर है तो पढ़ाओ नहीं तो बताओ की यह काम कर दो इतना पैसा मिलेगा". मैं अपने कुछ सहयोगी मित्रों के साथ यह काम पिछले पंद्रह वर्षों से कर रही हूँ.मुझे मेरे एक मित्र ने बताया की उन्होंने मेरी एक रचना हिन्दी कुंज में छपी हुई देखा है जिसे मुझे देखना चाहिए.शाम को घर देर से वापिस आई,काम से खाली होते-होते १.३० हो गया था और शनिवार की सुबह घर से सात बजे निकल कर उस लड़की की शादी के लिए इन्तेजाम के सिलसिले में कुछ लोगो से मिलना था सो, सो जाना ही सही लगा फिर तो मैं चर्चा मंच पर नहीं आ सकी.आज जब चर्चा मंच पर पहुंची तो समझ नहीं आया कहाँ लिखे,या पोस्ट करे फिर आप से सीधे आप के दर पर मिलना ज्यादा सही लगा.क्षमा पहले मांग चुकी हूँ,ध्यान रहे.
अनामिका जी ! समय ज्यादा हो रहा है,मेरे वो बार-बार पूछ रहे हैं आज पूरे साल का काम इकठ्ठा कर रही हैं क्या.जल्दी ही मिलूंगी ई-मेल के जरिये भी हम बात कर सकते हैं और ब्लॉग के जरिये से भी. शुभ-रात्रि!
शोभा गुप्ता
July 11, 2010
shobhaguptablog@gmail.com
http://meriduniameinmeribaat.blogspot.com/

1 टिप्पणी:

  1. शोभा जी शुक्रिया आप के ब्लॉग से मुझे आपका मेरे बारे में लिखा लेख मिला.

    बहुत बहुत अच्छा लगा पढ़ कर और जान कर आपके बारे में.

    अब आपको मेरी मेल आई डी मिल जायेगी...आप अब मुझसे टच में रह सकती हैं.

    समझती हू की आप बहुत बीसी हैं फिर भी उस दिन की चर्चा का जिसमे की आप की पोस्ट ली गयी थी लिंक दे रही हूँ.

    http://charchamanch.blogspot.com/2010/07/209.html

    एक बार फिर से शुक्रिया.

    आपके साथ आगे भी सम्बन्ध बना रहेगा इसी आशा के साथ

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